केजरीवाल का धोखा

जनलोकपाल का सच और केजरीवाल का धोखा
आख़िरकार दिल्ली मे पिछले दो महीने से चल रही नौटंकी का पटाक्षेप
हो हीं गया और इसके अभिनेता अरविंद केजरीवाल ने अब एक नयी पटकथा पे काम करना शुरू कर दिया है जोकि लोकसभा चुनाव है|जनता से पूछ कर हर क़ाम करने की कसम खाने वाले इस खिलाड़ी ने इस्तीफ़ा देते वक्त जनता की राय नही ली……ना कोई SMS ना कोई सभा बस दे दिया इस्तीफ़ा| कर दिया दिल्ली के जनादेश का बंटाधार| वैसे आख़िरकार अब संसद भवन दिख रहा है केजरीवाल को तो क्यूँ ना एक नौटंकी और की जाए और जनता को फिर से मूर्ख बनाया जाए|

खैर इस पोस्ट का मकसद केजरीवाल के झूठ का पर्दाफाश करना है ताकि वो खुद को शहीद का दर्जा ना दे पायें –

1. भाजपा को लोकपाल का विरोधी बताने से पहले केजरीवाल ये बात याद कर लेनी चाहिए थी अभी दो महीने पहले भाजपा ने हीं केंद्र मे लोकपाल क़ानून पास होने मे मदद करी और देश मे लोकपाल लागू हो चुका है|

2. जिस भी राज्य मे भाजपा की सरकार है वहाँ पर लोकायुक्त क़ानून पहले से हीं प्रभावी है इसलिए ऐसा कोई भी कारण नही था की विपक्ष मे बैठने के बाद भाजपा इसका विरोध करती| पहले आप बिल तो पेश करते लेकिन केजरीवाल को तो बस किसी भी तरह का बहाना चाहिए था लोकसभा चुनाव मे जाने का|
जानकारी के लिए याद दिला दूं की केजरीवाल के गुरु अन्ना हज़ारे ने भी भाजपा सरकार द्वारा उत्तराखंड मे बनाए गये लोकपाल को रोल-मॉडल बताया था|

3. दिल्ली मे कम करने के लिए आपके पास बहुत कुछ था| ऐसा नही था की केवल लोकपाल हीं एकमात्र मुद्दा था और बाकी मुद्दे अपने आप ठीक हो जाते| अगर आपकी नियत ठीक होती तो आप यहाँ टिक कर कुछ कम करते और फिर कॉंग्रेस/भाजपा को जवाब देते| लेकिन आपको तो लोकसभा और संसद दिख रही थी ऐसे मे आप करते भी क्या|
ज़िम्मेदारीओं से भागना आपके लिए कोई नयी बात नही है और नौटंकी करने मे आप बहुत हीं माहिर हैं|

4. भाजपा नेता हर्षवर्धन ने दो दिन पहले हीं बयान दिया था की केजरीवाल जनलोकपाल बिल लेकर आयें और भाजपा उसका समर्थन करेगी| इसके बावजूद भी केजरीवाल ने संविधान के मुताबिक बिल को पेश नही किया और खुद के शहीद होने का इंतेज़ाम किया|

5. संसदीय परंपरा के मुताबिक जनलोकपाल बिल की कॉपी उपराज्यपाल और विपक्ष को दी जानी चाहिए थी लेकिन उसे मीडीया को तो दे दिया गया परंतु विपक्ष/उपराज्यपाल को नही| अगर केजरीवाल की मंशा साफ थी तो बिल को उपराज्यपाल को भेजने मे क्या तकलीफ़ थी उन्हे|
अगर देश मे लोकतंत्र है तो इसे संविधान के अनुसार चलना है| दिल्ली केजरीवाल की दुकान नही है जिसे वो अपनी मन मर्ज़ी से चलाएँगे|

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