क्या नहीं था इस पहले सेमीफाइनल में ?

ऑकलैंड(न्यूजीलैंड)। क्या नहीं था इस पहले सेमीफाइनल में ? हिंदी मसाला फिल्मों का हर रंग था इसमें। आखरी दम तक जैसे ये मैच देखने वालों का इम्तहान ले रहा था। मन कहता था कि दक्षिण अफ्रीका इस बार अपनी छवि तोड़ कर ही रहेगा। लेकिन दिमाग कहता था, जो चोकर थे ,वो चोकर ही रहेंगे। दक्षिण अफ़्रीकी टीम ने भारत और पाकिस्तान से हार कर पहले ही यह बता दिया था कि वक़्त जरूर बदल गया है , मगर इस टीम में कोई तब्दीली नहीं आई है। ख़ास मौके पर टूट पड़ने के बजाय यह टीम ही टूट जाती है। न्यूजीलैंड ने हारने में कोई कसर नहीं रखी थी, लेकिन कोई हार के लिए तत्पर बैठा हो, तो कोई चाह कर भी कैसे हार सकता है। डी’विलियर्स ने इतने रिकॉर्ड तोड़े और बनाये लेकिन वह काम नहीं कर सके, जिसकी वजह से टीम फाइनल में पहुंच जाती।

कहते हैं कि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें शाप-मुक्ति कभी नहीं मिलती। दक्षिण अफ्रीका ऐसी ही टीम है ,जिसे अपने जन्म के समय से ही चोकर का खिताब ऐसा मिला है कि पीछा छोड़ ही नहीं रहा है। बार-बार यहीं तक आकर यह टीम खाली हाथ घर लौट जाती है।

आज क्या नहीं था? सब कुछ तो साउथ अफ्रीका के हिसाब से ही हो रहा था। बारिश भी आई तो रनों की बारिश ही कर गयी। जीत के लायक स्कोर तो उसके खाते में जमा हो ही गया था, बस आखिर तक उसे बचा के ही तो रखना था ,जो दक्षिण अफ़्रीकी टीम से नहीं हो पाया। हाथ में आई जीत किस तरह गवांईं जाती है, यह मैच उसका बेहतरीन नमूना है। अगर कप्तान ही हाथ आए मौके को न लपक पाए तो टीम से क्या उम्मीद की जाए। हर एक ने अपने हिस्से की गलती करने में कोई गलती नहीं की। दक्षिण अफ्रीका के बारे में शुरू से कहा जा रहा था कि उनके पास एक गेंदबाज कम है, लेकिन डी’विलियर्स ने एक बल्लेबाज ज्यादा खेलाने का क्यों तय कर रखा था, समझ में नहीं आया।

इसके उलट, न्यूजीलैंड के हर खिलाड़ी ने अपने हिस्से से ज्यादा ही टीम को दिया। एलियट और एंडरसन से सौ रनों की भागीदारी की उम्मीद भला कौन कर सकता था। दोनों ने जैसे अपने को हालात के हिसाब से ढाल लिया था। एक बारगी तो यही लगा जैसे टी20 मैच ही देख रहे हैं। दस रन से ज्यादा चाहिए थे हर ओवर में। पर इन दोनों ने विकेट बचा कर रखे और जब थके हुए गेंदबाज सामने आये तो जम कर पिटाई करने से भी नहीं चूके। यह वाकई उलझाने वाली गुत्थी हो सकती है कि मैकक्लम जब धुंआधार रन बना रहे थे, तो डी’विलियर्स को ताहिर की याद क्यों नहीं आई। यहीं से मैच का ऊंट दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ करवट लेने लगा था, क्योंकि तबतक मैकक्लम अपना काम पूरा कर चुके थे। रन-रेट इतना ज्यादा दे दिया था कि न्यूजीलैंड के बाकी के बल्लेबाजों से उस नींव पर महल बना लिया।

वैसे, शुक्रिया इस अफ़्रीकी टीम का। पहला सेमीफाइनल तो उसने यादगार बना ही दिया। आखरी गेंद तक नतीजा अगर तराजू के इस पलड़े से उस तरफ होता रहे, तो ऐसे मैच से ही क्रिकेट की उम्र लम्बी होगी। हार कर भी यह टीम कमाल कर ही जाती है। ऑस्ट्रेलिया के साथ खेला गया मैच, तो लोग आज भी याद करते हैं। आखिर में सिर्फ इतना ही कि यह अफ़्रीकी टीम ‘अंतिम विजय हमारी होगी’, यह कहना कब सीखेगी? और जब तक ऐसा नहीं करती है, इन्हें चोकर के धब्बे छुटकारा नहीं मिलने वाला।

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